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नम्र निवेदन

डास्रोमें पुराणोकी बड़ी महिमा हे उन्हे साक्षात्‌ लीं तो यह कोई त्प्रभकी बात नहीं है

श्रीहरिका रूप बताया गया है जिस प्रकार सम्पूर्ण भोगकी सामग्रियोका भी यह लाभ नहीं हे कि जगत्करो आलोकित करनेके छ्य भगवान्‌ सूर्यरूपम उनसे इन्दियोको तृप्र किया जाय; जितने भोगेसि ` प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते है, उसी जीवन-निर्वाह हो जाय, उतने ही भोग हमारे स्यि पर्याप प्रकार हमारे हदयान्धकार--भीतरी अनधकारको दूर हैँ तथा जीवन-निर्वाहका- जीवित रहनेका फर यह करनेके लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैँ ।#* नहीं है कि अनेक प्रकारके कमेकि पचडेमे पड़कर इस जिस प्रकार त्रैवर्णिकोके लिये वेदोंका खराध्याय नित्य लोक या परलोकका संसारिक सुख प्राप किया जाय करनेकी विधि हे, उसी प्रकार पुरार्णोका श्रवण भी उसका परम ल्भ तो यह है कि वास्तविक तत्वको- सबको नित्य करना चाहिये-- "पुराणं श्ृणुयान्नित्यम्‌' भगवत्तत्तको जाननेकी रद्ध इच्छा हो ।' | पुराणोमें अर्थ, धर्म, काम, योक्ष--चारोका बहुत ही यह तत्त्व-जिज्ञासा पुराणोके श्रवणसे भलीभाति ` सुन्दर निरूपण हुआ है ओर चारोका एक-दूसरेके साथ जगायी जा सकती है इतना ही नही, सारे साधनोका क्या सम्बन्ध है--इसे भी भलीभांति समञ्ञाया गया है। फक है--भगवानकी सन्नता प्राप्त कृराः1.श्यह

कै कौ > ध्र:

श्रीमद्धागवतमे छिखा है- भगवत्प्ीति भी पुराणोके श्रवणसे सहजमें हौ प्राप खी जा | धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्यते सकती है पद्मपुराणमें किखा है-- नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः तस्माद्यदि हरेः भ्रीतेरुत्पादे धीयते मतिः 3 कामस्य जेन्दरियभरीति्त्ीभो जीवेत यावता श्रोतव्यमनिहो पुम्भिः पुराणं कृष्णरूपिणः | जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥ (पद्य स्वर्ग ६२1 घर) ` क. (१।२। ९-१०) इसछ्ियि यदि भगवानको प्रसन्न करनेका मनमे `

धर्मका . फल है--संसारके बन्धनोंसे मुक्ति, सङ्कल्प हो तो सभी मनुष्योको निरन्तर श्रीकृष्णके

भगवानूकी प्रापि। उससे यदि कुछ सौसारिक सम्पत्ति अङ्गभूत पुराणोका श्रवण करना चाहिये इसीख्यि ˆ ~ उपार्जन कर री तो यह उसकी कोई सफलता नही है। पुराणोका हमारे यँ इतना आदर रहाहै। `“

इसी प्रकार धनका फर हे--एकमात्र धर्मका अनुष्ठान वेदोकी भाति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि #

५: बहन करके यदि कुछ भोगकी सामग्रियां एकत्र कर गये है उनका रचयिता कोई नहीं हे। ती 9 | < 5 (2

# यंथा ` सूर्यवपुर्भूत्वा प्रकाशाय चरेद्धरिः सर्वेष जगतामेव हरिरारोकहेतवे (2 तव 1 तथैवान्तःप्रकादाय पुराणावयवो हरिः। विचदिह भूतेषु पुराण पावनं परम्‌॥ = `

धन >." #- =

"1" माायतावातकि भी उनका स्मरणं ही करते है पद्यपुराणमे छिखा ८९ 7 पुराणं सर्वंडाखत्राणां थमे ब्रह्मणा स्मृतम्‌ इनका विस्तार सौ करोड़ (एक अरब) ङलोकोका माना गया है- ङातकोटिमिविस्तरम्‌ "उसी प्रसङ्खमें यह भी

कहा गया है किं समयक परिवर्तनसे जब मनुष्यकी आयु

\ कम हो जाती है ओर इतने बड़े पुराणोंका श्रवण ओर ^~ पठन एक जीवनमें मनुष्योके स्यि असम्भव हो जाता है तन उनका संक्षेप करनेके किय स्वयं भगवान्‌ भ्त्येक

इपर युगमें व्यासरूपसे अवतीर्णं होते है ओर उन्हे अठारह भागोमें बांटकर चार लख इरोकोमिं सीमित „कर देते हे पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही भूलोकमे / अकाडित होता है कहते हँ स्वर्गादि रोकोमे आज भी , एक अर इल्ोकोका विस्तृत पुराण विद्यमान है ।* इस श्रकार भगवान्‌ वेदव्यास भी पुराणोके रचयिता नहीं ' अपितु संक्षेपक अथवा संग्राहक ही सिद्ध होते है। इसीख्ियि पुरार्णोको “पञ्चम वेद' कहा गया है-- "इतिहासपुराणं पञ्छमं वेदानां वेदम्‌" (छान्दोग्य उपनिषद्‌ ७।१।२) उपर्युक्त उपनिषद्वाक्यके अनुसार यद्यपि इतिहास-पुराण दोनोंको ही “पञ्चम वेद" की ` गौरवपूर्ण उपाधि दी गयी है, फिर भी वाल्मीकीय रामायण ओर महाभारत जिनकी इतिहास संज्ञा है क्रमराः .महरषिं वाल्मीकि तथा वेदव्यासद्रारा प्रणीत होनेके कारण पुराणोंकी अपेक्षा अर्वाचीन ही हे इस ` म्रकार पुराणोकी पुराणता सवपिक्षया प्राचीनता सुतरा सिद्धःहो जाती ै। इसीरि वेदोकि बाद पुराणोका हो ` हमारे यहाँ सबसे अधिक सम्मान है बल्कि कहीं-कहीं तो उन्द वेदसे भी अधिक गौरव दिया गया हे।

ति यः तस्माद्धिचक्षणः

5 ७: : (सृष्टि २। ८५०-५१)

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जो ब्राह्मण अङ्ग एवं उपनिषदोसहित चासं जान रखता है; उससे भी बडा शत चारे वेदोका पुराणोका विकञेष ज्ञाता यान्‌ वेह है जो ता हे।' यहाँ श्रद्धालुओं स्वाभाविक भी यह शङ्का हो सकती है किः उपम रलोकोमें वेदोकी अपेक्षा भी पुराणोके ज्ञानको श्रष्ठ क्यो बतलाया हेत शाङ्काका दो भरकारसे समाधान किया जा सकता हे पहली नात तो यह दहै कि उपर्युक्तं रटेकके “विद्यात्‌ ओर `" विजानाति'- इन दो क्रियापदोपर विचार करनेसे यह ङाङ्का निर्मूरु हो जाती + हे बात यह है कि ऊपरके वचनम वेदोकि सामान्य ` ज्ञानक ऊपिक्षा पुराणोके विरिष्ट ज्ञानका वैरिष्य बताया गया है, कि वेदोकि सामान्य ज्ञानकी अयक्षा पुराणेक सामान्य ज्ञानका अथवा वेदोके विरिष्ट ज्ञानकी अपेक्षा + पुराणोके विरिष्ट ज्ञानका पुराणोमें जो कुछ है, वह ¦ वेदोका ही तो विस्तार--विदादीकरण है ेसी दशमे , पुराणोका विरिष्ट ज्ञान वेदोका ही विरिष्ट ज्ञान है ओर वेदोका विरिष्ट ज्ञान वेदोके सामान्य ज्ञानसे ऊँचा होना , | ही चाहिये दूसरी बात यह है कि जो बात वेदय सूत्ररूपसे कदी गयी है, वही पुराणोमें विस्तारसे वर्णित है उदाहरणके लिये परम तत्के निर्गुण-निराकार रूपका तो वेदों (उपनिषद) में विराद वर्णन मिता है परन्तु सगुण-साकार तत्त्वतका बहुत ही संक्षपमे कहीं-कहीं वर्णन मिरता है एसी दामे जह पुराणेकि | विरिष्ट ज्ञाताको सगण-निर्गुण दोनों तरत्वोका विरिष्टं | ज्ञान होगा, वेदोके सामान्य ज्ञाताको केवर निगण- | निराकारका ही सामान्य ज्ञान होगा इस प्रकार

7 2 णले ~ ~ (ऋ ~ (त 7)

रल्ोककी संगति भलीभति बैठ जाती है ओर

जो महिमा चास्रं वर्णित है, वह अच्छी तरह

जाती है। अस्तु, | पुराणोमिं पदयपुराणका स्थान बहुत ऊचा ।,

श्रीभगवान्‌करे पुराणरूप विग्रहका हदयस्थानीय

ब्रह्मा संग्रहा्थं॑युगे युगे

५५

गया है-- “हदयं पद्यसंज्ञकम्‌।' वैष्णवोंका तो यह सर्वस्व ही है। इसमे भगवान्‌ विष्णका माहास्य विरोषरूपसे वर्णित होनेके कारण ही यह वैष्णवोको अधिक प्रिय हे परन्तु पद्यपुराणके . अनुसार सर्वोपरि

देवता भगवान्‌ विष्णु होनेपर भी उनका ब्रह्माजी तथा

भगवान्‌ शङ्करके साथ अभेद प्रतिपादित हुआ है उसके अनुसार स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही ब्रह्मा होकर संसारकी सृष्टम प्रवृत्त होतेह तथा जबतक कल्पकी स्थिति बनी रहती है, तबतक वे भगवान्‌ विष्णु ही युग-युगमे अवतार धारण करके समूची सृष्टिकी रक्षा करते है पुनः कल्पका अन्त होनेपर वे ही अपना तमःप्रधान रुद्ररूप प्रकट करते हँ ओर अत्यन्त भयानक आकार धारण करके सम्पूर्ण प्राणिरयोका संहार करते हैँ इस प्रकार सब भूतोका नाडा करके संसारको एकार्णवके जल्मे निमय कर वे स्वरूपधारी भगवान्‌ स्वयं रोषनागकी ₹इाय्यापर इडायन करते हँ पुनः जागनेपर ब्रह्माका रूप धारण करके वे नये सिरेसे संसारकी सृष्टि करने रगते है इस तरह एक ही भगवान्‌ जनार्दन सृष्टि, पालन ओर संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा रिव नाम धारण करते हे ।* पद्मपुराणमें तो भगवान्‌ श्रीकृष्णके यहोतक वचन हे सूर्य, रिव, गणेश, विष्णु ओर दाक्तिके उपासक सभी मुञ्चको ही प्राप्त होते हैँ जैसे वर्षाका जल्‌ सब ओरसे समुद्रम ही जाता है, वैसे ही इन पांचा रूपके उपासक मेरे ही पास आते हें वस्तुतः मेँ एक ही ट्ीलाके अनुसार विभिन्न नाम धारण कर पांच रूपोमिं प्रकट हू जैसे एक ही देवदत्त नामक व्यक्ति पुत्र-पिता आदि अनेक नामोसे पुकारा जाता है, वैसे ही मुञ्ञको भिन्न-भिन्न नामोँसे पुकारते हँ एेसी ही बातें अन्यान्य पुराणेमिं भी पायी जाती हँ वैष्णवपुराणं हिव ओर बरह्माजीको विष्णुसे तथा हौवपुराणोमें भगवान्‌ विष्णु एवं ब्रह्माजीको राङ्करजीसे अभिन्न माना गया हे अतएव जो

# सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद्‌ ब्रह्मविष्णुरिवात्मकः। संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः (पद्य सृष्टि० २1 १४) ` ` = < = 2 सौरश्च रोवा गाणेडा वैष्णवाः राक्तिपूजकाः मामेव ्॒र्ुवन्तीह वर्षीपः सागर यथा <

लोग :पुराणोमें साग््रदायिकताका - गन्ध ~ पाते . है, वे वास्तवमे भूर करते हैँ यही प्रमाणित होता हे पद्मपुराणमें भगवान्‌ विष्णुके माहात्यके साथ. साथ भगवान्‌ श्रीराम तथा श्रीकृष्णके अवतार-चरखिरिं तथा उनके परात्पर रू्पोंका भी विरादरूपसे वर्णन हआ हे पातारुखण्डमे भगवान्‌ श्रीरामके अश्वमेधं यज्ञकी कथाका तो बहुत ही विस्तृत ओर अद्धुत वर्णन हे इतना ही नही, उसमें श्रीअयोध्या ओर श्रीधाम वृन्दावनका माहात्म्य, श्रीराधा-कृष्ण एवं उनके पार्षदोका वर्णन, वैष्णवोकी द्वादराराद्धि, पांच भ्रकासकी पूजा, शालग्रामके स्वरूप ओर महिमाका वर्णन, तिरूककी विधि, भगवत्सेवा-अप्रराध ओर उनसे छटनेके उपाय, तुुसीके वृक्ष तथा भगवन्नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवानकरे चरण-चिह्वोका परिचय तथा प्रव्येक मासमें भगवानकी विहोष आराधनाका वर्णन, मन्त्रचिन्तामणिका उपदेडा तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन, दीक्षा-विधि निर्गुण एवं सगुण-ध्यानका वर्णन, भगवद्धक्तिके लक्षणः वैडाख-मासमें माधव-पूजनकी महिमा, वैदाख, ज्येष्ठ ओर आषादढ्मे जलस्थ श्रीहरिके पूजनका माहात्य अश्वत्थक महिमा, भगवान्‌ श्रीकृष्णका ध्यान पित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासेमिं श्रीहरिकी पूजाम काम आनेवाङे विविध पुष्पका वर्णन, बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा, गङ्गाकी महिमा, त्रिरात्र तुरुसीत्रतकी विधि ओर महिमा, गोपीचन्दनके `

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७, तः # 01 ~ ~ 4 "५9 1 89 9.3१

तिलककी महिमा, जन्माष्टमी-त्रतकी महिमा, बारह `

महीनोकी एकादशियोकि नाम तथा माहाल्य, एकादङ्ीकी ` ` विधि, उत्पत्ति-कथा ओर महिमाका वर्णन, भगवद्‌- ` भक्तिकी श्रेष्ठता, वैष्णवोके लक्षण ओर महिमा भगवान्‌ , `

विष्णुके दसो अवतार्ोकी कथा, श्रीनृसिंहचतुर्दीके त्रतकी महिमा, श्रीमद्धगवदरीताके अटारहों अध्यारयोका ° अल्ग-अरूग माहात्म्य, श्रीमद्धागवतका माहात्य तथां

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श्रीमद्धागवतके विधि, नीलाचल- | निवासी. भगवान्‌ पुरुषोत्तमकी महिमा आदि-आदि एेसे अनेकों विषयोका समावेडा हआ है, जो वैष्णवोके स्यि + बड़े ही महत्त्वके है इसीचल्िये वैष्णवेमिं पद्यपुराणका विरोष समादर हे। | | | इनके अतिरिक्त सुष्टिक्रमका वर्णन, युग आदिका काल-मान, ब्रह्माजीके द्वारा रचे हए विविध सर्गोका वर्णन, मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र तथा स्वायम्भुव मनु आदिकी उत्पत्ति ओर उनकी सन्तान-परम्पराका वर्णन, देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोँकी उत्पत्तिका वर्णन, मरुद्र्णोकी उत्पत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन, पृथुके चस तथा सूर्यवंडाका वर्णन, पितरों तथा श्राद्धके ` विभिन्न अङ्गका वर्णन, श्राद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन, विविध आ्रद्धकी विधि, चन्द्रमाकी उत्पत्ति, पुष्कर आदि विविध तीर्थोकी महिमा तथा उन ती्थेमिं वास करने- वारक द्वारा पालनीय नियम, आश्रमधर्मका निरूपण, अन्नदान एवं दम आदि धर्मोकी प्रहोसा, नाना प्रकारके त्रत, स्नान ओर तर्षणकी विधि, तालार्बोकी प्रतिष्टा, वृक्षारोपणकी विधि, सत्सङ्गकी महिमा, उत्तम ब्राह्मण ` तथा गायत्री-मन्त्रकी महिमा, अधम ब्राह्यणोंका वर्णन, ब्राह्मणोके जीविकोपयोगी कर्म ओर उनका महत्व तथा गौओंकी महिमा ओर गोदानका फल, द्विजोचित आचार `. ' तथा रिष्टाचारका वर्णन, पितुभक्ति, पातित्रत्य, समता, अद्रोह ओर विष्णु-भक्तिरूप पांच महायज्ञोके विषयमे . पाँच -आख्यान, पतित्रताकी महिमा ओर कन्यादानका फर, सत्यभाषणकी महिमा, पोखरे खुदाने, वृक्ष रगान, पीपल्की पूजा करने, पौसङे चलाने, गोचरभूमि.छोडन, देवाय बनवाने ओर देवताओंकी पूजा करनेका 4 , रुद्राक्षकी उत्पत्ति ओर महिमा, श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, गणेदाजीकी -महिमा ओर उनकी स्तुति एवं ताकि क्षण. भगवान्‌ सूरयका तथा संक्रान्ति , ` सूर्यकी उपासना उसका

1 मनुष्ययोनिमे (4 #॥,

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नय ११,१०५४५.

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4 नैमित्तिक तथा आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन दहकगे उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण ओर

जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन, पापों

ओर पुरण्योके फलका वर्णन, नरक ओर स्वर्गमे जानेवाङे पुरुषोका वर्णन, ब्रह्मचारीके पालन करने योग्य नियम, ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म, स्नातक एवं गृहस्थके धर्मोका वर्णन, गृहस्थधर्मे भक्षयाभक्ष्यका विचार तंथा दानधर्मका वर्णन, वानप्रस्थ एवं सन्यास-आश्रमेकि धर्मोका . वर्णन, संन्यासीके नियम, खी-सङ्घकी निन्दा, भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण ओर गङ्गाकी महत्ता, जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवदइयकता, ` तीर्थयात्राकी विधि, माघ, वैराख तथा कार्तिक मासका माहात्म्य, यमराजकी आराधना, गृहस्थाश्रमकी प्ररंसा, दीपए्वली-कृत्य, गोवर्धन-पूजाः तथा यमद्वितीयाके दिन करने योग्य कृत्यका वर्णन, वैराम्यसे भगवद्धजनमे

= भ्रवृत्ति आदि-आदि अनेकों सर्वोपयोगी तथा सबके लिय

ज्ञातव्य एवं धारण करने योग्य धार्मिक विषयोका वर्णन हुआ है, जिनके कारण पद्मपुराण आस्तिक हिंटूमात्रके खयि परम आदरकी वस्तु हे | पद्मपुराणकी इस सर्वोपयोगिताको लक्ष्यमें रखकर्‌ ही कल्याणः में इसका संक्षिप्त अनुवाद छापनेकी आयोजना की गयी थी इससे भारतकी धार्मिक जनताका यदि कुछ भी उपकार हुआ होगा तो हम अपने प्रयासको सफल तथा अपनेको धन्य मानेगे अनुवादका कार्य आदिसे अन्ततक पे० श्रीरामनारायणदत्तजी शास््ीन बड़े परिश्रम एवं मनोयोगके साथ किया है तथा अनुवादक वत्ति तथा सम्पादन कसे एवं भ्रूफ-संदोधन आदि कसनमे सम्पादकीय विभागके सभी जन्धुओं तथा अन्य ` कई भ्रमी महानुभावोका प्रमपूर्णं एवं बहुमूलः | ्राप् हुआ है, जिसके किये उन्हं धन्यवाद देना तो = कार्यके महत्त्वको घटाना होगा ये सभी महानुभाव 0 ही है; ेसी दङामें उनकी बड़ाई अपनी ही बड़ाई हग

वाध अन्तमें हम अपना यह क्षुद्र प्रयास चरणेमिं अर्पित करते है ओर अपनी ्रयियेकि लि पुनः

सबसे हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हे हरिः तत्सत्‌ 4

यन्द विनीत- | #

विषय ` सृष्टि-खण्ड १-ग्रनथका उपक्रम तथा इसके सखरूपका पस्चिय -भीष्म ओर पुरस्त्यका संवाद-सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान्‌ विष्णुकी महिमा

..३-ब्रह्माजीकी आयु तथा युग आदिका कामान, `

:-:. भगवान्‌ वराहद्वारा पृथ्वीका रसातलसे उद्धार

` .. ओर ब्रह्माजीके द्वारा सचे हुए विविध सर्गोका

वर्णन

४-यज्ञके लिय ब्राह्मणादि वर्णो तथा अन्नकी सृष्टि,

मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र॒ तथा खायम्भुव मनु आदिकी उत्पत्ति ओर उनकी संतान- परम्पराका वर्णन /८-लक्ष्मीजीके प्रादुर्भावकी कथा, समुद्र-मन्थन ओर अमृत-प्राप्ति -सतीका देहत्याग ओर दक्ष-यज्ञ-विध्वंस -. . ७-देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोंकी उत्पत्तिका वर्णन ८-मरुद्र्णोकी उत्पत्ति, भिन्न-भिन्न समुदायके राजाओं तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन . - ९-पुथुके चरित्र तथा सूर्यवंराका वर्णन १०-पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्खोका वर्णन ११-एकोदिष्ट आदि श्राद्धोंकी विधि तथा श्रद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन ` १२-चन््रमाकी उत्पत्ति तथा यदुवंश एवं (~ सहस्रार्जुनके प्रभावका वर्णन १२-यदुवंशके अन्तर्गत क्रोष्ट आदिके वंडा तथा श्रीकृष्णावतारका वर्णन १४-पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहां वास करनेवाले

लोगेकि छ्यि नियम तथा आश्रम-धर्मका `

निरूपण १५-पुष्कर क्षत्रमे ब्रह्माजीका यज्ञ ओर सरस्वतीका प्राकस्य १६-सरस्वतीके नन्दा नामं पड्नेका इतिहास ओर उसका माहात्म्यं १७-पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महर्षि अगस्त्यके प्रभावका वर्णन

१८-सपर्षि-आश्रमके प्रसङ्गमे सपर्षियोकि अलोभका `

वर्णन तथा ऋषियेकि मुखसे अन्नदान एवं दम आदि धर्मोकी प्ररोसा

श्रीहरिः

; ˆ ९4

१९ २२९

२६ .

विषय

विषय-सूची (1

पृष्ठ-संख्या

१९-नाना प्रकारके त्रत, स्नान ओर तर्पणकी विधि तथा अन्नादि पर्वतेकि दानकी मङोसाम्रे राजा धर्ममूर्तिकी कथा २०-भीमद्रादरी-त्रतका विधान ¦ २१-आदित्य-शयन ओर रोहिणी-चन्द्र-दायन-त्रत, तडागकी प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणकी विधि तथा सोभाग्य-ङयन-व्रतका वर्णन २२-तीर्थ-महिमाके प्रसङ्गे वामन-अवतारकी कथा, भगवानका बाष्कल दैत्यसे त्रिलोकीके राज्यका अपहरण २३-सत्सङ्गके प्रभावसे पांच प्रेतका उद्धार ओर पुष्कर तथा ग्राची सरस्वतीका माहात्म्य = -- - र४-मार्कण्डेयजीके दीर्घायु होनेकी कथा ओर श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मण ओर सीताके साथ पुष्करमें जाकर पिताका श्राद्ध करना तथा अजगन्ध शिवकी स्तुति करके लौटना २५ब्रह्माजीके यज्ञके ऋत्विजोंका वर्णन, सब देवता्ओंको ब्रह्माद्वारा ` ` वरदानकी अधि, श्रीविष्णु ओर श्रीरिवद्वारा ब्रह्माजीकी स्तुति तथा ब्रह्माजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थेभिं अपने नामों ओर पुष्करकी महिमाका वर्णन २६-श्रीरामके द्वास राम्बूकका वध ओर मेरे हए ब्राह्मण-बारुकको जीवनकी प्राति महर्षिं अगस्त्यद्रारा राजा तके उद्धारकी कथा २८-दण्डकारण्यकी उत्पत्तिका वर्णन २९-श्रीरामका र्का, रामेश्वर, पुष्कर एवं मथुरा होते हए गङ्गातटपर जाकर भगवान्‌ श्रीवामनकी स्थापना. करना ३०-भगवान्‌ श्रीनारायणकी महिमां, युरगोका पर्चिय प्रल्यके जलम मार्कण्डेयजीको भगवान्‌के दर्शन तथा भगवानकी नाभिसे कमल्की

७9 9 9०० ७०७० ०७७०००००

३१-मधु-कैटभका वध तथा सृष्टि-परम्पराका वर्णन

३२-तारकासुरके जन्मकी कथा, तारककी तपस्या उसंके द्वारा देवता्ओंकी पराजय.ओर ब्रह्माजी का देवताओंको सान्त्वना देना .+-- °^ “~

३३-पार्वतीका जन्म, मदन-दहन पार्वतीकी तपस्या

+ 9 ` # 4 23 विवाह ४# उनका भगवान्‌ रिवके सा =. १३८ ` (=, श, ५५ | (` < 315 = 8 3 (-* <. 3 = ~ १५ न, ति ४१८ वं 1

पष्ट-संख्या

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` ३४-गणेड ओर कार्तिकेयका जन्म तथा कार्तिकेय द्वारा तारकासुरका वध ------.------.- ३६-अधम ब्राह्य्णोका वर्णन, पतित विप्रकी कथा ओर गरुडजीका चरित्र ३७-त्राह्मणोकि जीविकोपयोगी कर्म ओर उनका महत्व तथा गोओंकी महिमा ओर गोदानका

वर्णन ३९-पितुभक्ति, पातित्रत्य, समता, अद्रोह ओर विष्णुभक्तिरूप पांच महायज्ञोके विषयमे ब्राह्मण नरोत्तमकी कथा ४०-पतित्रता ब्राह्मणीका उपाख्यान, कुरुटा सियोके सम्बन्धे उमा-नारद-संवाद, पतिव्रताकी महिमा ओर कन्यादानका फल ४९-तुलाधारके सत्य ओर समताकी प्रहोसा, सत्य- भाषणकी महिमा, खोभ-त्यागके विषयमे एक डद्रकी कथा ओर मूक चाण्डारु आदिका

= | + ४र-पोखेरे खदाने, वृक्ष गाने पूजा करने, पसे (प्याऊ) चाने, गोचरभूमि छोडने, देवाय बनवाने ओर देवताओंकी पूजा,

` दे-रुद्राक्षकी 7 उत्पत्ति ओर महिमा तथा आओंवलेके फरुकी महिमां तरेतोकी कथा ओर तुरुसी- = दलका ठ्‌ करा माहात्म्य ~°“ "` ` ४४-तुलसी-सतोत्रका वर्णन -रग्ञाजोकी मदमा ओर उनकी उति जीकी महिमा मा ओर उनकी स्तुति एवं

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पृष्ठ-संख्या

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३५-उत्तम ब्राह्मण ओर गायत्री-मन्त्रकी महिमा १५०

२५५

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विषय

५९-सोमरार्माकी पितुभक्ति

५२-सुत्रतकी उत्पत्तिके प्रसङ्गः सुमना ओर

शिवरर्माका संवाद--विविध प्रकारके रोका वर्णन तथा दुर्वासाद्रारा धर्मको शाप ५२-सुमनाके द्वारा ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्ग धर्म तथा धर्मात्मा ओर पापियोकी मृत्युका वर्णन ५४-वसिष्ठजीके द्वारा सोमरामाकि पूर्वजन्मसम्बन्धी शुभारुभ कर्मोका वर्णन तथा उन्हे भगवानके भजनका उपदेरा ५५-सोमडामकि द्वारा भगवान्‌ श्रीविष्णुकी आराधना, भगवानका उन्हं दर्न देना तथा सोमरार्माका उनकी स्तुति करना ५६-श्रीभगवान्‌के वरदानसे सोमरार्माको सुत्रत नामक पुत्रकी प्राप्ति तथा सुत्रतका तपस्यासे माता-पितासहित वेकुण्ठलोकमें जाना ५.७-राजा पृथुके जन्म ओर चरित्रिका वर्णन ५८ -मृत्युकन्या सुनीथाको गन्धर्वकुमारका हाप, अङ्खकी तपस्या ओर भगवान्‌से वर-प्राप्ति ५९-सुनीथाका तपस्याके ख्ये वनमें जाना, रम्भा आदि सखियोंका वहो पर्हुचकर उसे मोहिनी विद्या सिखाना, अङ्खके साथ उसका गान्धर्व विवाह, वेनका जन्म ओरं उसे राज्यकी प्राप्ति ६०-छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जेन-धर्मका वर्णन, उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापम प्रवृत्ति ओर सपर्षियोद्रारा उसकी भुजाओंका मन्थन ६१-वेनकी तपस्या ओर भगवान्‌ श्रीविष्णुके द्वार उसे दान-तीर्थ आदिका उषदेडा ६२-श्रीविष्णाद्वारा नैमित्तिक ओर आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन ओर पलीतीर्थके ्रसङ्गमे

सती सुकलाकी कथा ६३-सुकलयका रानी सुदेवाकी महिमा बताते हुए

एक शकर ओर शुकरीका उपाख्यान सुनाम

डुकरीद्रारा अपने पतिक पूर्वजनमका वर्णन

द४-हुकरीद्वारा अपने पूर्वजन्मके वृततात्तक वध तथा रानी सुदेवाके दिये हुए पुण्यसे उसका

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विषय ६६-सुकलाके स्वामीका तीर्थयात्रासे लौटना ओर धर्मकी आज्ञासे सुकलके साथ श्राद्धादि करके देवताओंसे वरदान प्राप्त करना ६७-पितृतीर्थके प्रसङ्गमें पिप्परूकी तपस्या ओर सुकर्माकी पितुभक्तिका वर्णन, सारसके कहनेसे

पिप्पका सुक्मकि पास जानी ओर सुकर्माका उन्हँं माता-पिताकी सेवाका महत्त बताना

६८-सुकर्माद्रारा ययाति ओर मातक््कि संवादका

उल्रेख-मातक्िके द्वारा देहकी उत्पत्ति, 8

उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण ओर जीवनके

कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन ६९-पापों ओर पुण्योके फर्का वर्णन ७०-मातक्के द्वारा भगवान्‌ रिव ओर श्रीविष्णुकी महिमाका वर्णन, मातक्िको विदा करके राजा ययातिका वेष्णवधर्मके प्रचारद्रारा भूलोकको वैकुण्ठतुल्य बनाना तथा ययातिके द्रबारमें काम आदिका नाटक खेलना ७१-ययातिके डउरीरमं जरावस्थाका प्रवे, कामकन्यासे भेंट, पृरुका यौवन-दान, ययातिका कामकन्याके साथ प्रजावर्गसहित वेकुण्ठधाम-गमन ७२-गुरुतीर्थके प्रसङ्गमें महर्षि च्यवनकी कथा- कुञ्जर पक्षीका अपने पुत्र उज्ज्वलको ज्ञान, त्रत ओर स्तोत्रका उपदेह ७३-कुञ्जकका अपने पुत्र विज्वरूको उपदेश-- महर्षिं जैमिनिका सुबाहुसे दानकी महिमा कहना तथा नरक ओर सर्गम जानेवाछे पुरुषोका वर्णन ७४-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्वकको श्रीवासुदेवाभि- धान-स्तोत्र सुनाना ७८-कुञ्जरु पक्षी ओर उसके पुत्र कपिञ्जरूका संवाद--कामोदाकी कथा ओर विहृण्ड दैत्यका वध ७६-कुञ्जलका च्यवनको अपने पूर्व-जीवनका वृत्तान्त बताकर सिद्ध पुरुषके कहे हए ज्ञानका

उपदेडा करना, राजा वेनका यज्ञ आदि करके .

विष्णुधाममे जाना तथा पद्मपुराण ओर ग~ भूमिखण्डका माह्मन्म्य ०९०७० ७००७० ००००७००७

पृष्ट-संख्यां तिषय पृष्ठ-संख्या स्वर्ग-खण्ड 1 ७७-आदि सृष्टिक क्रमका वर्णन ~°“ ~“ ˆ ` ` ३३२ ९०९ ७८-भारतवर्षका वर्णन ओर वसिष्ठजीके द्वारा पुष्कर तीर्थकी महिमाका बखान “--* “° ° २२३३ ७९-जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमर- कण्टक पर्वत तथा कावेरी-सङ्गमकी महिमा ३३६ ९८९ ८०-नर्मदाके तटवरतीं तीर्थोका वर्णन ----- --- ३३८ ८९-विविध तीर्थोकी महिमाका वर्णन ---* ° - ~ दे . <२-धर्मतीर्थ आदिकी महिमा, यमुना-स्नानका माहात््य-हेमकुण्डल वैर्य ओर उसके 3 पत्रौकी कथा एवे स्वर्गं तथा नरकमे ठे ५. जानेवाठे उुभाडुभ कर्मोका वर्णन --*--- ३४९ ८२-सुगन्ध . आदि तीर्थोकी महिमा तथा कारी- पुरीका माहात्म्य ----------- "~~ - ३५८ ८४-पिाचमोचनकुण्ड एवं कपर्दीश्चरका माहात्य--पिशाच तथा राङ्ककरणंमुनिके मुक्त होनेकी कथा ओर गया आदि तीर्थोकी महिमा ३६१ ८५-ब्रह्मस्थुणा आदि तीर्थो तथा प्रयागकी महिमा; इस प्रसङ्खके पाठका माहात्म्य *.*--*०-* °. ३६६ == ८६-मार्कण्डयजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको म्रयागकी महिमा सुनाना *-**-**-*----- - ३६८ ८७-भगवानके भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा ३७५. ३१० <८ब्ह्चारीके पर्न करनेयोग्य नियम ~^“ ३७८ ` ८९ ब्रह्मचारी रिष्यके धर्म... ३८३ ९०-स्नातक ओर गृहस्थके धर्मोका वर्णन ~ ~~ ३८७ ९१-व्यावहारिक रिष्टाचारका वर्णन =-= -- - ३९० “~ ३१५ र९र-गृहस्थधर्ममे भक्याभक्ष्यका विचार तथादान- धर्मका वर्णन ६.०००.००० ०००. ३९८ ९३-वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन -----*-* ३९७ ९४-संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन ८.२९ ५-संन्यासीके निय ००० ००. & ३२२ ९द-भगवद्भक्तिकी प्ररोसा, खी -सङ्गकी निन्दा, ` व:

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3 पाताक-खण्ड ९८-रेषजीका वात्स्यायन मुनिसे रामाश्चमेधकी कथा | आरम्भ करना. , श्रीरामचन्द्रजीका लङ्खासे अयोध्याके स्यि विदा होना ९९-भरतसे मिरूकर भगवान्‌ श्रीरामका अयोध्याके निकट आगमन १०० -श्रीरामका नगर-परवेङा, माताओंसे मिलना राज्य ग्रहण करना तथा रामराज्यकी सुव्यवस्था १०९१-देवताओद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान देना तथा रामराज्यका वर्णन १०२-श्रीरामके दरबारमें अगस्त्यजीका आगमन, उनके द्वारा रावण आदिके जन्म तथा तपस्याका वर्णन ओर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवानका अवतार छेना ९०३-अगस्त्यका अश्वमेध यज्ञकी सलाह देकर अश्चकी परीक्षा करना तथा यज्ञके स्यि आये , ` हए ऋषिर्योद्रारा धर्मकी चर्चा ९ठ४-यज्ञसम्बन्धी अश्चका छोड़ा जाना ओर श्रीरामका ` उसकी रक्षाके छ्य उात्रुघ्रको उपदे करना १०५-दत्रघ्र ओर पुष्कर आदिका सबसे मिरूकर ^ ^ सनासहित घोडेके साथ जाना, राजा सुमदको ६. कथा तथा सुमदके द्वारा शात्रुघ्रका सत्कार ` | |. ९०द-शत्रघ्रका राजा सुमदको साथ केकर आगे जाना +“ ओरच्यवनमुनिके आश्रमपर पहचकर सुमतिके

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सुकन्यासे न्यासे व्याह 695 ७-सु न्याके द्वारा पतिकी सेवा, च्यवनको योवन-

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विषय ` ९९ ९- चक्राङ्का नगरीके राजकुमार दमनद्रारा घोड़ेका चका जाना तथा राजकुमारका भ्रतापामूयको युद्धम परास्त करके स्वयं पुष्कल्के द्वारा ' पराजित होना -----°०., ९९२-राजा सुबाहुका भाई ओर पुत्रोसहित युद्धमे आना तथा सेनाका क्रोञ्च-व्यूहनिर्माण १९३-राजा सुबाहुकी प्रहंसा तथा लक्ष्मीनिधि ओर सुकेतुका दरन्द्र-युद्ध

११४-पुष्ककके हारा चित्राङ्गका वध, हनुमानूजीके

चरण-प्रहारसे सुबाहुका रापोद्धार तथा उनका आत्मसमर्पण ११५-तेजःपुरके राजा सत्यवान्‌की जन्मकथा-- सत्यवान्का रखात्रुघ्रको सर्वस्व-समर्पण ११६-ङातुघ्रके द्वारा विद्युन्माटी ओर उग्रदष्टका वध तथा उसके द्वारा चुराये हुए अश्चकी प्राप्ति

११.७-रातरुघ्र आदिका घोडेसहित आरण्यक मुनिके

आश्रमपर जाना, मुनिकी आत्म-कथामें रामायणका वर्णन ओर अयोध्यामें जाकर उनका श्रीरघुनाथजीके स्वरूपमें मिरु जाना ११९८-देवपुरके राजकुमार रुवमाङ्गदद्रारा अश्चका अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओमें युद्ध ओर पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना ११९-हनुमान्‌जीके द्वारा वीररसिंहकी पराजय वीरभद्रके हाथसे पुष्करका वध, शाङ्करजीके

द्वारा इत्रुघ्रका मूर्छित होना, हनुमानके पराक्रमसे दिवका सन्तोष,. हनुमानजीके उद्यीगसे मरे

हए वीरोका जीवित होना, श्रीरामका प्रादुर्भाव

ओर वीरमणिका आत्मसमर्पण १२०-अश्चका गात्र-स्तम्भ श्रीरामचस्तर-कीर्तनसे स्वर्गवासी ब्राह्मणका राक्षसयोनिसे उद्धार

तथा अश्वके गात्र-स्तम्भकी निवृति . -राजा स्रथके द्वारा अश्चका पकड़ा अ" उनौर उनके प्रभावका वर्णन, अङ्गदका दूत बनकर राजाके यहा जाना ओर राजाका युद्धके स्यि तैयार होना 565८६

१२२-युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्करूका =! जाना 'हनुमानूजीका चम्पकको मूर्छित पुष्कलको

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विषय १२३-वाल्मीकिके आश्रमपर कवद्वारा घोडेका धना ओर अश्च-रक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना १२४-गुप्तचरोसे अपवादकी बात सुनकर श्रीरामका भरतके प्रति सीताको वनम छोड आनेका अदेडा ओर भरतकी मूच्छ १२५-सीताका अपवाद करनेवाले धोनीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त १२६-सीताजीके त्यागकी बातसे शातरुघ्रकी भी मूर्च्छा, लक्ष्मणका दुःखित चित्तसे सीताको जंगल छोडना ओर वाल्मीकिके आश्रमपर कव-कुडाका जन्म एवं अध्ययन १२७-युद्धमें कुवके द्वारा सेनाका संहार, कालजित्का वध तथा पुष्कल ओर हनुमान्‌जीका मूर्छित होना १२८-रातरघ्रके बाणसे रवकी मूर्च्छा, कुडाका रण- त्रम आना, कुडा ओर कूवकी विजय तथा सीताके प्रभावसे इात्ुघ् आदि एवं उनके सेनिकोकी जीव-रक्षा ०००००..-०--.००-. १२९-रत्रुघ आदिका अयोध्यामे जाकर श्रीरघुनाथजीसे मिलना तथा मन्त्री सुमतिका उन्हे यात्राका समाचार बतलाना

१३०-वाल्गीकिजीके द्वारा सीताकी शुद्धता ओर |

अपने पुत्रोका परिचय पाकर श्रीरमका सीताको लानेके छ्य लक्ष्मणको भेजना, लक्ष्मण ओर सीताकी बातचीत, सीताका अपने पुत्रको भेजकर स्वयं आना, श्रीरामकी प्ररणासे पुनः

लक्ष्मणका उन्हं बुलानेको जाना तथा रोषजीका.

वात्स्यायनको रामायणका परिचय देना १३१-सीताका आगमन, यज्ञका आरम्भ, अश्चकी मुक्ति, उसके पूर्वजन्मकी कथा, यज्ञका उपसंहार ओर रामभक्ति तथा अशमेध-कथा-श्रवणकी महिमा १३२-व॒न्दावन ओर श्रीकृष्णका माहात्म्य १३३-श्रीराधा-कृष्ण ओर उनके पार्ष्दोका वर्णन तथा नारदजीके द्वारा व्रजमें अवतीर्णं श्रीकृष्ण ओर राधाके दर्हन

१३४-भगवानके परात्पर सखरूप--श्रीकृष्णकी महिमा

तथा मथुराके माहात्म्यका वर्णन

पृष्ठ-संख्या; विषय

८,९१

५५९२

५१८

५९२१

५२८

५.२९

५,२७

५२९

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१३५-भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा व्रज तथा द्वारका्े निवास करनेवार्कोकी मुक्ति, वैष्णवोंकी द्राददा

रद्धि, पच प्रकारकी पूजा, शाक्गरामके खरूप `

ओर महिमाका वर्णन, तिलककी विधि, अपराध

ओर उनसे छूटनेके उपाय, हविष्यान्न ओर तुलसीकी महिमा १३६-नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवानके चरण- चिका परिचय तथा प्रत्येक मासमे भगवानूकी विहोष आराधनाका वर्णन १२३७-मन्त्रचिन्तामणिका उपदेडा तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन १३८-दीक्षाकी विधि तथा श्रीकृष्णके द्वारा रुद्रको युगल-मन्त्रकी प्राप्ति १३९-अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन १४०-भगवद्धक्तिके लक्षण तथा वैडाख-स्नानकी महिमा १४१-वैराख-माहात्म्य १४२-वैशाख-सनानसे पाँच प्रर्तोका उद्धार तथा. "पाप-प्रडामन' नामक स्तोत्रका वर्णन १४३-वैराख मासमे सान, तर्षण ओर श्रीमाधव- पूजनकी विधि एवं महिमा १४४-यम-ब्राह्मण-संवाद- नरक तथा स्वर्गमें ठे जानेवाङे कर्मोका वर्णन १४५-तुसीदरु ओर अश्चत्थकी महिमा तथा वैशाख-माहात्यके सम्बन्धे तीन मरेतकि उद्धारक कथा १४६-वैराख-माहाव्यके अ्रसङ्गमे राजा महीरथकी कथा ओर यम-ब्राह्मण-संवादका उपसंहार १४७-भगवान्‌ श्रीकृष्णका ध्यान उत्तरखण्ड

१४८-नारद-महीदेव-संवाद्- बदरिकाश्रम तथा `

नारायणकी महिमा

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१४९-गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा ओर हरिद्रारकां

पृष्ठ-संख्या

५६१

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८८ ८.८९

५९३

५९६